हम प्रायः अपने कर्मों को उनके निकट और तात्कालिक प्रभावों से आँकते हैं : जो मैं देखता हूँ, जो मुझ तक लौटता है। पर हर निर्णय उस दायरे से कहीं आगे तक तरंगें फैलाता है, उन लोगों तक जिनसे मैं कभी न मिलूँगा, दीर्घ काल तक, जीवित जगत् तक। सेजोक्रेसी इन अदृश्य प्रभावों को निर्णय में समेट लेने को विस्तारित उत्तरदायित्व कहती है। सद्गुण से नहीं : केवल स्पष्ट दृष्टि से।
संकीर्णता स्वार्थ नहीं, अंधापन है
जो दूर के परिणाम देखे बिना निर्णय करता है, वह अनिवार्यतः दुर्भावी नहीं : वह वास्तविकता के एक हिस्से के प्रति अंधा है। हमारे आम उपकरण, क़ीमत, तिमाही, सीमा, वास्तविकता को इतने छोटे टुकड़ों में काट देते हैं कि प्रभाव सदा ढाँचे के बाहर छलक जाते हैं। प्रदूषण, क्षय, कहीं और खिसका दी गई पीड़ा, ये दुर्घटनाएँ नहीं : ये वे परिणाम हैं जिन्हें हमने बस देखना छोड़ दिया।
दृष्टि को विस्तृत करना, नैतिकता को भारी करना नहीं
विस्तारित उत्तरदायित्व हर बात के लिए अपराधबोध नहीं माँगता। वह माँगता है कि निर्णय के ढाँचे को इतना फैलाया जाए कि उसके वास्तविक परिणाम उसमें समा जाएँ। एक स्पष्ट निर्णय उन्हें शामिल करता है जिन पर वह असर डालता है। यह नैतिक बंधन से कम, सटीकता की माँग अधिक है : जिस वास्तविकता को काट-छाँट दिया गया हो, उस पर भला निर्णय नहीं किया जा सकता।
यह ठोस रूप में क्या बदलता है
निर्णय करना एक ऐसा कार्य बन जाता है जो और दूर तक देखता है : तय करने से पहले यह जाँचा जाता है कि और कौन प्रभावित होगा, धारा के नीचे की ओर, कल, और कैसे। सब कुछ ठप करने के लिए नहीं, बल्कि इसलिए कि दूसरों को हमारी सुविधा की क़ीमत न चुकानी पड़े। कोई निर्णय तभी पूर्ण होता है जब वह अपने परे जो कुछ छेड़ता है, उसका भार उठा ले।