गहरा

एक जीवित शरीर जैसा समाज

एक शरीर में कोई अंग आदेश नहीं देता, फिर भी सब कुछ स्वयं को समायोजित करता है। और यदि कोई समाज ऐसे चल सके : शिखर से नहीं, संबंधों से?

एक जीवित शरीर जैसा समाज

एक सेजोक्रेटिक समाज को सबसे अच्छे से पकड़ने वाली छवि न मशीन है, न पिरामिड, बल्कि जीवित जीव। एक शरीर में हर अंग का अपना काम है, कोई केवल अपने लिए नहीं करता, और कोई सचमुच दूसरों को आदेश नहीं देता। फिर भी सब कुछ आपस में टिका रहता है और निरंतर समायोजित होता है। और यदि कोई समाज इसी ढंग से चल सके?

एक शरीर, जहाँ कोई आदेश नहीं देता

एक शरीर में हृदय यकृत का काम नहीं करता, न यकृत मस्तिष्क का। हर अंग का अपना काम है, पर कोई केवल अपने लिए नहीं करता : वह समूचे के संतुलन पर उतना ही निर्भर है जितना उसमें योगदान देता है। मस्तिष्क समन्वय करता है, आदेश नहीं देता। सूचना निरंतर बहती है, और जब कहीं असंतुलन उभरता है, तो किसी मुखिया को हर बात तय किए बिना, समूचा शरीर स्वयं को समायोजित कर लेता है। जादू से नहीं, बल्कि इसलिए कि हिस्से आपस में जुड़े हैं। जो अंग औरों की क़ीमत पर बढ़ता है उसका एक नाम है : अर्बुद।

जीवित जगत् से प्रेरणा लेना, उसकी नक़ल किए बिना

सेजोक्रेसी यह दावा नहीं करती कि समाज कोई जैविक जीव है। वह बस उसे देखती है जो जीवित जगत् ने अरबों वर्षों में गढ़ा है : संबंधों से संतुलन, सूचना के संचरण से अनुकूलन, विविधता से प्रतिरोध, गति से स्थिरता। इतने सारे गुण जिन्हें आदेश की किसी पिरामिड ने कभी पैदा नहीं किया, और जिन्हें फिर भी कोई समाज अपने पैमाने पर पुनः पा सकता है।

संकट, शत्रु नहीं, संकेत

इस तरह सोचा गया समाज संकटों को जीतने वाले शत्रु के रूप में देखना छोड़ देता है। एक संकट कुछ कहता है, जैसे एक पीड़ा या एक ख़राबी। सामान्य प्रतिवर्त है संकेत को चुप करा देना ; जीवित जगत् का तर्क है उसे सुनना ताकि समझ सकें कि क्या बदलना है। यह अव्यवस्था के साथ हमारे संबंध का पूर्ण उलटाव है। यह बुद्धि किसी नगर या देश के पैमाने पर ठोस रूप से क्या देती है, पुस्तक, जो प्रकाशित होने वाली है, खोलकर रखेगी ; यह लेख केवल छवि रख भर देता है।

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