गहरा

सीखना ग्रहण करना नहीं है

स्कूल मानता है कि बच्चा किसी पात्र की तरह भरा जाता है। पर हम सचमुच वही सीखते हैं जो हमसे जुड़ा हो और जिसे हमने जिया हो।

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सीखना ग्रहण करना नहीं है

एक बच्चा पढ़ता है कि मधुमक्खियाँ अरबों की संख्या में लुप्त हो रही हैं। उसने सूचना समझ ली, पर अर्थ नहीं, न ही वह जो उसके पीछे दाँव पर है। एक साधारण कक्षा में उसे एक बँधा-बँधाया उत्तर मिलता, वह अपनी कॉपी में तीन पंक्तियाँ लिखता, और आगे बढ़ जाया जाता। सूचना पहुँचा दी गई होती, फिर भी कुछ न घटता। सेजोक्रेसी इसी सरल अवलोकन से शुरू होती है : किसी विषय-वस्तु को ग्रहण करना सीखना नहीं है।

स्कूल की छिपी हुई मान्यता

स्कूल जैसा हम उसे जानते हैं, एक शायद ही नामित विचार पर टिका है : कि बच्चा एक पात्र है जिसे भरा जाता है, और सीखना यानी ग्रहण करना, याद रखना, फिर लौटा देना। यह मान्यता निरर्थक नहीं ; इसने तो कुछ ही पीढ़ियों में अरबों लोगों को साक्षर बना दिया, एक बहुमूल्य उपलब्धि जिसे उलटना अभिप्रेत नहीं। पर वह जड़ हो गई, और अंततः उसने वह ढक दिया जो वह नहीं देखती थी : एक मनुष्य किसी भरे जाते हार्ड डिस्क की तरह नहीं सीखता। वह रिश्तों से, अनुभव से, और उस से सीखता है जो उसके लिए अर्थ रखता है। शिक्षक यह जानते हैं, प्रायः किसी से भी बेहतर ; समस्या उनकी निष्ठा नहीं, बल्कि एक ढाँचा है जिसने पढ़ाने को विषय-वस्तु पहुँचाने से गड्डमड्ड कर दिया।

सीखना यानी मिलना

एक सेजोक्रेटिक तर्क में, सीखना एक ऐसे प्रश्न से आरंभ होता है जो सीखने वाले का अपना है, जीवंत क्योंकि उसके जीवन के उस क्षण में उसके होने का एक कारण है। उसी से सब कुछ खिसक जाता है। वयस्क अब केवल जानने वाला नहीं रहता : वह वह बन जाता है जो साथ चलता है, जो भाँप लेता है कि अगला पड़ाव पार करने के लिए क्या कम है, और उसे ठीक समय पर उपलब्ध कराता है। उम्रें आपस में मिल जाती हैं, क्योंकि छोटा कभी वह समझ लेता है जो बड़ा अब नहीं देखता। भूल एक अपराध होना बंद करके फिर वही बन जाती है जो वह है : एक बहुमूल्य सूचना, एक आवश्यक पड़ाव। विषय-वस्तु इससे लुप्त नहीं होती : व्याकरण, गणित, इतिहास, विज्ञान बने रहते हैं। पर वे अपने आप में एक लक्ष्य होना बंद कर, यथार्थ के संपर्क में बनती एक समझ की सेवा में औज़ार बन जाते हैं।

ज्ञान से परे जो गढ़ा जाता है

इस तरह बड़ा होता बच्चा केवल पढ़ना और गिनना नहीं सीखता। वह ऐसी क्षमताएँ विकसित करता है जिन्हें हमारी व्यवस्थाएँ ठीक से नहीं माप पातीं : किसी समूह की गतिकी को भाँपना, प्रदर्शन करने के बजाय योगदान देने का प्रयास करना, जीवित को एक साज-सज्जा की तरह बरतने के बजाय उससे रिश्ता बनाना। ये क्षमताएँ कोई पूरक नहीं ; वे ऐसे प्राणी गढ़ती हैं जो यथार्थ में अपना रास्ता पा सकें। कोई समुदाय इस हस्तांतरण को ठोस रूप में कैसे आयोजित करता है, आहत होकर आते बच्चों का कैसे स्वागत करता है, और हर उम्र में सीखने के लिए कैसा स्थान रचता है, पुस्तक, जो प्रकाशित होने वाली है, खोलकर रखेगी ; यह लेख केवल उसका सिद्धांत रखता है।

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