गहरा

जहाँ समझ हो, वहीं निर्णय

सेजोक्रेसी में निर्णय किसी आदेश देने वाले केंद्र को नहीं सौंपा जाता, बल्कि वहीं रखा जाता है जहाँ स्थिति सचमुच समझी जाती है। न संख्या, न दूर की विशेषज्ञता : वास्तविकता के जितना निकट हो सके, उतनी स्पष्ट दृष्टि।

Un groupe de personnes de tous âges et origines, réuni au bord d'un champ et d'une rivière, examine ensemble une carte posée sur une caisse en bois — la décision prise là où la situation est comprise, en Sageocratie.

हम सत्ता को हमेशा एक शिखर के रूप में सोचते हैं : कोई, कहीं, बाक़ी सबके लिए निर्णय करता है। लोकतंत्र हो या तकनीकतंत्र, ढाँचा वही रहता है — एक केंद्र आदेश देता है, परिधि पालन करती है। सेजोक्रेसी प्रश्न को खिसका देती है : यदि निर्णय न तो सबसे अधिक संख्या वालों का हो, न सबसे अधिक डिग्री वालों का, बल्कि उनका हो जो स्थिति को सचमुच समझते हैं, तो? जहाँ समझ हो, वहीं निर्णय — कहना आसान है, और यह लगभग सब कुछ बदल देता है।

सत्ता जिस पर निर्णय करती है, उससे दूर हट जाती है

जितना ऊपर कोई निर्णय किसी केंद्र की ओर चढ़ता है, उतना ही वह उस ज़मीन से दूर होता जाता है जिससे उसका सरोकार है। जो फ़ैसला करता है, उसने प्रायः न वह स्थिति जी है, न उसके परिणाम भुगतने हैं। यह दुर्भावना का प्रश्न नहीं, दूरी का प्रश्न है : दूर बैठकर लिखा गया एक ही नियम एक पहाड़ी गाँव और एक महानगर, दोनों पर एक साथ नहीं बैठ सकता। सेजोक्रेसी बेहतर नेता नहीं ढूँढती; वह निर्णय को उस जगह के निकट लाना चाहती है जहाँ वास्तविकता सचमुच जानी जाती है।

थोपा गया नहीं, उभरता हुआ निर्णय

निकट लाना बिखेरना नहीं है। सही निर्णय ऊपर से नहीं उतरता; वह उनके बीच उभरता है जो एक स्थिति साझा करते हैं और उसके दाँव को पकड़ते हैं : निवासी, काम में लगे लोग, प्रभावित लोग — हर कोई वास्तविकता का एक हिस्सा लाता है। सहमति स्पष्ट दृष्टि से बनती है — क्योंकि अंततः लोग मिलकर साफ़ देख लेते हैं — न कि दबाव से, न केवल वोट गिनने से। जो दूसरे थोप देते, सेजोक्रेसी उसे वहीं बनने देती है जहाँ उसका अर्थ है।

यह ठोस रूप में क्या बदलता है

एक सेजोक्रेटिक समाज पिरामिड से कम और एक बुनावट से अधिक मिलता-जुलता है : आपस में जुड़े निर्णय-स्थल, जहाँ अधिकार पद का नहीं, समझ का अनुसरण करता है। किसी घाटी के पानी पर कौन निर्णय करे? वे जो वहाँ रहते हैं और वे जो उसका जल-विज्ञान जानते हैं, मिलकर — न कि कोई दूर का दफ़्तर जो उसकी एक बूँद भी कभी न देखेगा। निर्णय केवल वहीं ठोस होता है जहाँ कोई पर्याप्त रूप से समझता है कि वह किस पर निर्णय कर रहा है।