«सेजोक्रेसी» शब्द एक लगभग अप्रतिरोध्य ग़लतफ़हमी की ओर ले जाता है : ज्ञानियों का शासन। तुरंत मन में एक परिषद् उभरती है — श्रेष्ठ, प्रबुद्ध प्राणियों की, जो अपने ज्ञान की ऊँचाई से शेष मानवता के लिए निर्णय करते हैं। सेजोक्रेसी ठीक यही नहीं है। शासकों को «ज्ञानियों» से बदल देना केवल सत्ता को खिसकाएगा — उसे रूपांतरित नहीं करेगा।
ज्ञान कोई उपाधि नहीं है
नियुक्त किया गया ज्ञानी शीघ्र ही ज्ञानी नहीं रह जाता। जैसे ही किसी को इसलिए अधिकार मिलता है कि उसे ज्ञानी माना गया, उसका हित इसी में हो जाता है कि वह दूसरों की नज़र में वैसा बना रहे : अपनी बात न पलटे, अपनी जगह बचाए, जो उसे असहज करे उसे किनारे कर दे। पद बन चुका ज्ञान हर सत्ता की तरह भ्रष्ट होता है। सेजोक्रेसी जो चाहती है वह लोगों की कोई श्रेणी नहीं, बल्कि निर्णय का एक गुण है : स्पष्ट दृष्टि — साफ़ देखना, संबंधों को ध्यान में रखना, स्वयं को सुधारना स्वीकार करना। यह स्पष्ट दृष्टि किसी की निजी संपत्ति नहीं।
थोपी गई नहीं, संभव बनाई गई स्पष्ट दृष्टि
यह भेद निर्णायक है। सत्ता सौंपने के लिए सही लोगों को ढूँढने के बजाय, एक ज्ञानी समाज सही परिस्थितियाँ ढूँढता है ताकि स्पष्ट दृष्टि उभरे — किसी में भी, सही जगह, सही क्षण : साझा जानकारी, समझने का समय, भय या दबाव का अभाव, दृष्टियों की विविधता। ज्ञानी चुने नहीं जाते; हर किसी को उस जगह, जहाँ वह निर्णय करता है, थोड़ा और विवेकवान बना दिया जाता है।
यह बारीकी सब कुछ क्यों बदल देती है
ज्ञानियों पर टिकी व्यवस्था मनुष्यों पर टिकी होती है — त्रुटि-प्रवण, भ्रष्ट किए जाने योग्य, नश्वर। साझा स्पष्ट दृष्टि पर टिकी व्यवस्था एक करने के ढंग पर टिकी होती है : दोहराई जा सकने वाली, जाँची जा सकने वाली, सुधारी जा सकने वाली। सत्ता को बेहतर धारकों से नहीं बदला जाता; सत्ता के तर्क को स्पष्ट दृष्टि के तर्क से बदला जाता है। सेजोक्रेसी आज्ञा मानने के लिए ज्ञानी नहीं ढूँढती : वह ज्ञान को हर जगह संभव बनाना चाहती है।