एक आदमी हर सुबह छह बजे उठता है, चालीस मिनट गाड़ी चलाता है, एक कंप्यूटर के सामने बैठता है और जो कहा जाए वही करता है। वह अच्छा कमाता है, उसका एक रुतबा है : कागज़ पर, वह काम करता है। कुछ किलोमीटर दूर, एक स्त्री अपनी बीमार माँ की पूरे समय देखभाल करती है। उसे कोई वेतन नहीं मिलता, उसका योगदान किसी सूचकांक में नहीं दिखता। एक उस अर्थ में काम करता है जो व्यवस्था समझती है ; दूसरी योगदान देती है, पर पहचान केवल पहले को मिलती है। सेजोक्रेसी ठीक इसी अंतर से शुरू होती है।
काम, वेतन वाली बात तक सिकोड़ा हुआ
हमारे समाजों में काम की धारणा एक बहुत सँकरी परिभाषा में बंद कर दी गई है : काम वही है जो वेतन को जन्म देता है, जो किसी अनुबंध में बैठता है, जिसे घोषित और गिना जा सके। बाकी सब हाशिये पर रहता है। किसी अपने को दी गई देखभाल, माता-पिता द्वारा बच्चों को दी शिक्षा, किसी अकेले पड़ोसी पर दिया ध्यान, ज्ञान का हस्तांतरण, किसी साझा बगीचे की सार-सँभाल : व्यवस्था की नज़र में इनमें से कुछ भी काम नहीं, फिर भी यही एक समाज को थामे रखता है। यह परिभाषा तटस्थ नहीं है। जिसे वह नहीं पहचानती वह अंततः अस्थिर होकर लुप्त हो जाता है। यों हमने एक ऐसी दुनिया रच दी है जहाँ बेकार नौकरियाँ अच्छी तनख़्वाह पाती हैं और आवश्यक योगदानों को बिलकुल भी नहीं पहचाना जाता।
काम करने से योगदान देने की ओर
सेजोक्रेसी केंद्रीय शब्द को हटा देती है। काम करना अपनी जगह योगदान देना को दे देता है। अंतर हल्का लगता है ; वह बहुत कुछ बदल देता है। काम करना यानी किसी अनुबंध से बँधी और वेतन वाली गतिविधि करना। योगदान देना यानी वह सब जो मदद करता, थामता, मरम्मत करता, आगे पहुँचाता, शांत करता या चीज़ों को संभव बनाता है। काम एक प्रशासनिक श्रेणी है ; योगदान एक जीवंत यथार्थ। अब यह नहीं पूछा जाता «जो मैं करता हूँ उसका वेतन मिलता है क्या?», बल्कि «जो मैं करता हूँ वह कुछ लाता है क्या?»। रिलियांस की बदौलत यह वास्तविक योगदान अपने हर रूप में दृश्य और पहचाना हुआ बन जाता है। वेतन अब वह एकमात्र तरीका नहीं रहा जिससे कोई समाज किसी से कहे कि जो तुम करते हो वह मायने रखता है।
तो फिर, गरिमा का क्या?
वह प्रश्न बचा रहता है जिसका सामना हर आर्थिक रूपांतरण को करना ही होता है : उसका क्या होता है जो योगदान नहीं दे सकता, बच्चा, गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति, शोक से गुज़रता कोई, अति वृद्ध? उत्तर स्पष्ट है, और यही सेजोक्रेसी को उन सभी विचारधाराओं से अलग करता है जिन्होंने एक जीवन के मूल्य को उसकी उपयोगिता पर टाँगना चाहा : भोजन, आवास, देखभाल और शिक्षा तक पहुँच कभी योगदान पर नहीं टँगी होती। योगदान को पहचानना, हाँ ; गरिमा को शर्त पर रखना, कभी नहीं। यह विस्थापन किसी जीवन, किसी परिवार, किसी मोहल्ले को ठोस रूप में कैसे बदलता है, पुस्तक, जो प्रकाशित होने वाली है, कहेगी ; यह लेख केवल उसका द्वार खोलता है।