गहरा

और यदि गड़बड़ी कोई दुर्घटना न हो तो?

नेता कोई भी हों, हमारे संकट लौट-लौट आते हैं। और यदि ये व्यवस्था की ख़राबियाँ न हों, बल्कि ठीक वही हों जो वह पैदा करती है?

और यदि गड़बड़ी कोई दुर्घटना न हो तो?

हमारे समाजों की कठिनाइयों के सामने, धन का चरम संकेंद्रण, जीवित जगत् का क्षय, फैलता अविश्वास, एक प्रतिवर्त हावी हो जाता है : किसी दोषी को ढूँढना। एक बुरा नेता, एक असफल नीति, एक दुर्भाग्यपूर्ण निर्णय। पर इस व्याख्या में कुछ खटकता है। नेता बदलते हैं, युग बीतते हैं, और वही समस्याएँ भिन्न रूपों में लौट आती हैं। मानो, व्यक्तियों के पीछे, कोई चीज़ वही परिणाम पैदा करती रहती है। और यदि जो ठीक नहीं है वह कोई दुर्घटना न हो तो?

व्यवस्था वही करती है जिसके लिए वह बनी है

एक व्यवस्था वही परिणाम पैदा करती है जिनके लिए उसे रचा गया। यदि ये परिणाम हमें बेतुके लगते हैं, तो ज़रूरी नहीं कि वह ख़राब चल रही हो : शायद वह बहुत अच्छे से चल रही है, पर वह पैदा करने के लिए जो हम उससे अपेक्षा करते हैं उससे भिन्न है। मुद्रा को ही लीजिए। वह हवा जितनी स्वाभाविक जान पड़ती है, फिर भी वह एक रचना है, इस तरह से बँधी कि वह अंतहीन वृद्धि की माँग करती है। यह विचारधारा का नहीं, तंत्र का प्रश्न है। यह विचार बेचैन करता है, क्योंकि वह दृष्टि को खिसका देता है : जब तक हम दोषी ढूँढते हैं, हम आशा करते हैं कि उन्हें बदलने से सब ठीक हो जाएगा।

यह मानव-स्वभाव नहीं है

तब वह आपत्ति आती है जो हर ओर सुनाई देती है : «यह मानव-स्वभाव है, मनुष्य ऐसे ही हैं, हर समाज अंततः प्रभुत्व और संचय पर उतर आता है।» शायद यही वह वाक्य है जो हमें परिवर्तन पर विश्वास करने से सबसे अधिक रोकता है, क्योंकि यदि यह मानव-स्वभाव है, तो कुछ किया ही नहीं जा सकता। सिवाय इसके कि यह सच नहीं। दसियों हज़ार वर्षों तक, जटिल मानव समाज, कभी-कभी सचमुच के नगर, बिना राजाओं के, बिना अभिजनों के, बिना ऊपर से आदेश देने वाली नौकरशाही के अस्तित्व में रहे। यदि यह रहा है, तो जिसे हम शाश्वत मान बैठते हैं वह अनेकों में से बस एक व्यवस्था है।

यह स्वयं क्यों नहीं सुधरेगी

एक बेचैन करने वाला प्रश्न शेष रहता है : यदि इतने लोग व्यवस्था की सीमाएँ देखते हैं, तो सचमुच कुछ क्यों नहीं बदलता? क्योंकि खेल के जारी रहते हुए उसके नियम फिर से नहीं लिखे जाते। भीतर से रहकर, कोई बेहतर खेल सकता है, किसी अच्छे उद्देश्य के लिए जीत सकता है, अपनी जीत को फिर से बाँट सकता है ; पर नियम नहीं बदल सकता। व्यवस्था तो अपनी ही आलोचना को भी सोख लेती है : एक समिति, एक मुहर, एक रिपोर्ट, और आलोचना स्वीकृत हो जाती है बिना मूल के हिले। इसीलिए वह स्वयं नहीं सुधरेगी। सेजोक्रेसी इस खेल को बेहतर खेलने का प्रयास नहीं करती : वह उसके धरातल को ही बदलने का प्रस्ताव देती है। पुस्तक, जो प्रकाशित होने वाली है, बताएगी कैसे ; यह लेख केवल समस्या को नाम देने भर का काम करता है।

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